Thursday, February 22, 2024

माना कि बाजार है ,मगर बाजारीकरण के बहाने अपनी यौन फंतासियो को क्यों बेच रहे हो?

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यह तो बिल्कुल पल्ले दर्जे की नीचता हुई कि ऐशट्रे में स्त्री की वजाइना में सिगरेट की राख झाडी जाये। बडी घिनौनी हरकत यह है की स्त्री के मुहँ के आकार का टाँयलेट बनाकर उसमें पेशाब किया जाये। औरत का बाजारीकरण इस तरह कर दिया गया है कि अकल खूँटी पर टांगकर औरतो के अलग अलग अंगो को कलाकृति के नाम पर परोसा जा रहा है, असल में ये कलाकृतियाँ नहीं है बल्कि आदमी की मानसिक विकृतियाँ हैं जो बनाने वाले व खरीदने वाले के मानसिक दिवालियेपन को दिखा रही हैं। कला की आजादी के नाम पर यह औरत के साथ हो रही क्रूरता है , बदनीयती है।

amazon ashtray औरत
कला के नाम पर कब तक ??

कभी आँस्कर वाइल्ड ने कहा था कि दुनिया की तमाम खूबसूरती औरत बिना बेकार है। सही भी है ये मगर दुनिया में तमाम बदनीयती भी औरत के लिये घर कर गयी है इस समाज में। जैसा कि माना जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक पशु है , अंदर से वह पाशविक प्रवृत्ति रखता है जो सभ्यता व सज्जनता के आवरण में कहीं छिप सी जाती है । मगर पशुवत होकर बाजार में औरत के अंगो का सामान बनाकर खुली नुमाईश क्या साबित करती है, यहीं ना कि दिमाग खराब हैं हमारे , पेशाब के लिये औरत का लाल लिपिस्टक लगा मुहँ, सिगरेट की राख रखने के लिये औरत की योनि । दिमाग के दिवालियेपन में कोई कसर नहीं रह गयी है इन सब कथित कलाकृतियों के कलाकारो में व इन बेचने वाली कंपनियो में। कला के नाम पर काली करतूत है ये ,कुत्सित कारनामा है।

आखिर ई काँमर्स कंपनी अमेजोन ने ऐसा उत्पाद बेचने का दुस्साहस कैसे कर दिया जो औरत को आँब्जैक्ट बनाने में सारी हद पार कर गया । माना कि बाजार है ,मगर बाजारीकरण के बहाने अपनी यौन फंतासियो को क्यों बेच रहे हो?

ये यौन फंतासियाँ बंद कमरे की चीज है , दिमाग में चलती फिरती इमेज हैं ,लेकिन आप तो इसे कलाकृति के नाम पर सार्वजनिक ही परोसने लगे वो भी बकायदा बडे भव्य व आकर्षक ढंग में।
इस पखवाडे में अमेजोन नाम से दो चीजे सामने आयी ,विडंबना देखिये दोनो ही स्त्री से जुडी हुई। पहली है वंडर वुमैन की नायिका जो प्राचीन मिथकीय अमेजन कबीले ( यौद्धा नारियो का कबीला)  से जन्मी दिखाई गयी । अगर आपको नहीं पता तो बताता चलूँ कि अमेजन काँकेशश के पहाडो में रहने वाला प्राचीन स्त्री कबीला जो अपने  बल व पराक्रम के कारण ग्रीक व पूरे यूरोप में प्रसिद्ध था। वंडर वुमैन में एक अमेजन महिला को नारी शक्ति का प्रतीक बनकर उभरने का मौका मिला ,पूरे विश्व में फिल्म हिट रही व  स्त्री सशक्तिकरण व नायकत्व का प्रतीक बनी। वहीं दूसरी ओर अमेजोन कंपनी ने ऐशट्रे के नाम पर स्त्री का घिनौना मजाक बनाया जिसकी चौतरफा भारी आलोचना हो रही है। जैसे ही ये मामला सोशल मीडिया पर दिखा तो तुरन्त लेखिकाओ ने अमेजोन कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया व तगडा विरोध दर्ज कराया । हर ओर सोशल मीडिया पर इस कुत्सित करतूत का विरोध हुआ , स्त्री लेखको ने जबरदस्त तरीके से इस बाजारीकरण के नये बिजूका को आडे हाथो लिया ,खूब मलामत की , नतीजा यह निकला कि अमेजोन को यह उत्पाद वापिस लेना पडा।

amazon ashtray औरत
amazon वेबसाइट पर ऐशट्रे

सलाम है औरतो की इस जवाबी कार्यवाही पर , प्रबल प्रतिरोध पर। आखिर आज औरतो को अपनी आवाज उठाने के लिये किसी का मुहँ नहीं ताकना पडा , बस सोशल मीडिया के सहारे हुंकार भरी व बाजारीकरण के नाम पर , कला के नाम पर हो रहे दैहिक दिखावे को, औरत के आँब्जैक्ट दिखाने को  ना केवल कोसा  बल्कि उसे  रोका भी।

“आँन लिबर्टी ” निबन्ध में ब्रितानी दार्शनिक जाँन स्टुअर्ट मिल ने लिखा है कि आपकी स्वतंत्रता व अधिकार वहाँ खत्म हो जाते हैं जहाँ से दूसरे की नाक शुरू होती है।

बिल्कुल जहाँ से औरत के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है वहाँ से एक कलाकार की कला के नाम पर आजादी भी खत्म । आखिर  आर्टिस्टिक फ्रीडम के नाम पर औरत के अंगो को सामान बनाकर घिनौने रूप में नहीं बेचा जा सकता ।

खोट आपकी नजरो में है , सोच में है यह कहकर किसी भी अश्लील प्रस्तुतीकरण का बचाव केवल घुमावदार बच निकलने का रास्ता है क्योंकि आँखो देखी चीज एकदम से मस्तिष्क में क्लिक होती है और तुरन्त ही विचारो का जत्था उठ खडा होता । विचार भी तो वस्तु या सामान का ही उत्पाद है, तुरंत हर चीज मस्तिष्क खारिज नहीं कर पाता क्योंकि उसकी अपनी भी फंतासी है सो वह भी रचने में लग जाता है । और दिमाग ठहरा हजारो वर्षो के प्रचार प्रसारो का परिणाम तो द्वंदात्मत दलदल  में तुरंत गिर जाता है । नैतिकता बनाम  भौतिकता का मुद्दा नहीं है ये बल्कि व्यापार के नाम पर , कला के नाम पर यौन फंतासी को रचनो का मुद्दा है , अगर आपकी चारदीवारियो तक था तो भी चलता मगर सार्वजनिक दुराचार की तरह  था इस तरह के उत्पादो को बाजार में लाना और फिर उसका खरीददार बनाना।
वो तो ठीक हुआ जो औरतो ने सोशल मीडिया पर जबरदस्त हंगामा किया व अमेजोन कंपनी को अपने हाथ पीछे खींचने पडे, वहीं उस रेस्टोरेंट को भी टाँयलेट बदलना पडा वैसे भी समाज व सभ्यता इतनी पाशविक भी नहीं हुई कि हर चीज को कला के नाम पर इस्तेमाल करे ।

-मनीष पोसवाल

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