Wednesday, July 17, 2024

दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर घुमंतू वन गुज्जर

दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर घुमंतू वन गुज्जर 
उत्तराखंड में स्थित राजाजी नेशनल पार्क दुनियाभर में मशहूर है,यहां का प्राकृतिक सौंदर्य हर किसी को लुभाता है,लेकिन इसी प्राकृतिक सौन्दर्य को जीवंत बनाए रखने में अपनी अहम भूमिका निभाने वाली एक घुमंतू वन गुज्जर जाति की पीड़ा को आज तक कोई नहीं समझ पाया,जिस तरह किसी मां द्वारा अपने बच्चे को पाल पोसकर बड़ा करने के बाद वह मां को ही भूल जाता है और उसे ठोकरें खाने को मजबूर कर देता है ठीक उसी तरह ये लोग भी आज खुद को अकेला और लाचार महसूस कर रहे है । अपने घर में आए मेहमान को पलको पर बिठाने वाली यह जाति आज खुद मेहमान बन कर रह गई है।

कहानी शुरू हुई थी करीब 1980 के आस पास , जब वन गुज्जर घुमंतू जाति राजाजी नेशनल पार्क(1983)में आराम से अपना जीवन यापन कर रहे थे,1983 में जब राजाजी नेशनल पार्क बना तो पार्क प्रशाशन द्वारा इस घुमंतू जाति को पुनर्वासित करने की योजना बनाई गई

इसी कड़ी में पार्क प्रशाशन द्वारा 1998 में 512 परिवारों को पथरी हरिद्वार तथा 878 परिवारों को गैंडीखाता में बसाया गया।बाकी बचे हुए परिवारों को पार्क प्रशासन द्वारा समय समय पर प्रताड़ित किया जाता रहा,यहां तक कि उनके डेरों(घर) को भी तोड़कर उनके बच्चों को बिना छत के रहने को मजबूर कर दिया तथा जबरदस्ती पार्क से बाहर खदेड़ने का प्रयास किया गया।


ये परिवार नदियों तथा सड़क के किनारे रहने को मजबूर हो गए,तथा इनके छोटे छोटे बच्चे जिन्होंने कभी अपने डेरे से बाहर निकल कर भी नहीं देखा बिना छत के खुले आसमान के नीचे सर्दियों की रात गुजारने को विवश होना पड़ा। कुछ लोगों पर गलत तरीके से इल्जाम लगाते हुए उन्हें गिरफ़्तार करवाया गया,जिसमे 28 जून 2011 को नूरजमाल वन गुज्जर पर बिहारीगढ़ थाने में गिरफ़्तारी के बाद किसी तरह बमुश्किल उसे छुड़ाया जा सका।

वन गुज्जर कल्याण समिति के माध्यम से सन 2007 में 457 परिवारों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया,न्यायालय ने इनका वन अधिकार अधिनियम 2006 के माध्यम से निस्तारण करने का आदेश दिया,लेकिन अधिनियम की जानकारी ना होने के कारण स्थिति जस की तस बनी रही और ना ही पार्क प्रशासन ने इस ओर ध्यान दिया। काफी कोशिशों के बाद पार्क प्रशासन द्वारा 2009 में छूटे हुए परिवारों की गणना करने के बाद 1610 परिवार सामने आए।

26 नवंबर 2013 को सरकार ने अपने एक आदेश में चिल्लावली में निवासरत 247 वन गुज्जर परिवारों को शाहमनसूर बंदरजूड में बसाने का आदेश दिया। लेकिन पार्क प्रशाशन पर इसका कोई असर नहीं हुआ।बल्कि उन्होंने 2017 में इन 247 परिवारों के साथ साथ  रामगढ़ में निवासरत 136 परिवारों को भी जबरदस्ती इनके डेरों को तोड़कर पार्क से बाहर खदेड दिया। गौहरी रेंज में भी पार्क प्रशासन ने वन गुज्जर परिवारों को बाहर करने की कोशिश कि परंतु किसी तरह वे लोग अपना घर उजड़ जाने के बाद भी वही बने रहे।

पार्क के कर्मचारियों द्वारा जब चाहे जैसे चाहे इन पर अपना जुल्म किया जाता रहा।इतना सब होने के बाद भी अतिक्रमण की आड़ में 11 सितम्बर 2018 को कुछ अधिकारियों द्वारा श्यामपुर क्षेत्र में डेरे तोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई,इस दौरान वन गुज्जरों के अधिकारों के लिए काम कर रही संस्था थिंक एंड राइज के उत्तराखंड निदेशक अमीर हमजा बानिया और जिला हरिद्वार निदेशक फैजान पोसवाल ने समय से पहुंचकर किसी तरह इन परिवारों को बेघर होने से बचाया, लेकिन विभाग द्वारा इनके खिलाफ साजिश के तहत झूटी रिपोर्ट थाने में दर्ज करवाई गई,जिसे ये लोग अभी तक झेल रहे हैं तथा थाने के चक्कर काटने को विवश हैं। जबकि विभाग के द्वारा किसी भी तरह का नोटिस आदि इन परिवारों को नहीं दिखाया गया था।  THINK ACT RISE FOUNDATION (TARF) संस्था अगर इनकी मदद नहीं करती तो ये लोग साजिश का शिकार हो सकते थे,इससे इन्हें कानूनी मदद के साथ साथ अपने अधिकारों को जानने में मदद मिली।


सवाल ये उठता है कि आख़िर क्यों इस घुमंतू जाति जिसने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा, को समय समय पर यातनाएं झेलनी पड़ती है,सिर्फ इसलिए कि ये लोग अनपढ़ है या इन लोगो में विरोध ना करने की प्रवृति इनके इस हाल के लिए जिम्मेदार है। अगर किसी वन गुज्जर परिवार के मुखिया से पूछा जाए कि उसकी खुशी किस चीज में है तो उसका जवाब होगा कि “साहब मेरी भेंसो को खाने को अच्छा मिल जाए बस मैं और मेरा परिवार उसी में खुश है हमें और ज्यादा कुछ नहीं चाहिए”।

पशुओ से इतना प्रेम करने वाली इस जाति पर पार्क प्रशासन तरह तरह के इल्जाम लगाकर इनको बदनाम करने की साजिश रचता आ रहा है। इनको शिक्षा,स्वास्थ्य व अन्य सुविधाएं देना तो दूर इनकी भैंसों को जो कि इनके  जीविकोपार्जन का मुख्य स्रोत है इनके  चारा आदि को रोककर उन्हें तड़प तड़प कर मरने दिया गया।

ये विडंबना ही है कि जिन बच्चो के कंधो पर बस्ते होने चाहिए थे  वो किसी सड़क या नदी के किनारे पर तंबूओ में रह रहे हैं जहां उनका अशियांना कभी भी उजड़ सकता है और उन्हें फिर से किसी नए स्थान की तलाश करनी पड़ेगी,जिस बूढ़ी मां ने सारी उमर कठिन परिश्रम करके आज आराम करने का वक्त है तो वो मां अपने आंखो के सामने उजड़ रहे आशियाने को देखकर तड़प उठती है।इन बचे हुए 1610 परिवारों की वर्तमान समय में कोई भी सुध लेने वाला भी नहीं हैं,ये कहां किस हालत में है किसी को परवाह नहीं है।

 THINK ACT RISE FOUNDATION (TARF) के उत्तराखंड निदेशक अमीर हमजा बानिया का कहना है कि “ये लोग जहां पर अस्थाई रूप से रह रहे हैं वहां पर इन्हें किराया आदि देना पड़ रहा है तथा इनके पशु जो कि जंगल के आदि हैं नए हालात से तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं जिससे कि उनकी मृत्यु हो रही है,इनकी भेेंसो के लिए चारा आदि की व्यवस्था पहले जंगल में ही हो जाती थी,परंतु अब 100% चारा इन्हें खरीद कर लाना पड़ता है जिससे इनकी आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है,ये लोग अनपढ़ और अकुशल हैं क्योंकि इनका पारम्परिक व्यवसाय पशुपालन ही रहा है इसलिए ये लोग कोई अन्य काम करना नहीं जानते इस कारण इन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

“इसी संस्था के हरिद्वार निदेशक फैजान पोसवाल कहते हैं कि “ये लोग पारम्परिक रूप से जंगलों में रह रहे हैं इनको बिना किसी व्यवस्था के जंगलों से खदेड़ कर बाहर कर देना इनके भविष्य को अंधकार में धकेलना है,इनको इसी तरह इनके हाल पर छोड़कर तथा इनकी उम्मीद भरी नज़रों को नजरंदाज कर किस तरह एक नए भारत निर्माण का सपना देखा जा सकता है।ये लोग सदियों से जंगलों की हिफाजत करते आ रहे और आज उन्ही जंगलों से इन्हें अलग कर इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया गया है”!भविष्य में  हो सकता है कि इनका ये जनसंख्या का आंकड़ा ही बदल जाए व पार्क प्रशासन किसी भी परिवार के ना होने का आंकड़ा पेश करे।आने वाले समय में भी पार्क में रह रहे  इन परिवारों के भविष्य को लेकर पार्क प्रशासन कोई तैयारी करता नहीं दिख रहा है और ना ही इन्हें किसी तरह की कोई सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

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