भारत मे पंचायती राज की परिकल्पना करने वाले तत्कालीन नीतिकारो का लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए एक अच्छा प्रयास था । पंचायती राज सैद्धांतिक रूप मे जितना सुन्दर दिखता है व्यावहारिक रूप मे भी उतना ही सुन्दर बन जाए तो हम इस विश्वास के साथ कह सकते है कि भारत देश विश्व मे सर्वश्रेष्ठ देश बन जायेगा ।लेकिन सबसे बडी विडंबना यह है कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था सैद्धांतिक रूप मे जितनी महान है व्यवहारिक रूप मे उतनी ही पिछडी हुई है ।यहाँ पंचायत चुनाव मे धन बल औऱ बाहुबल का प्रयोग किसी से. छुपा नहीं है ।धनबल औऱ बाहुबल के सहारे पंचायत चुनाव जीतने वाले पंचायत प्रतिनिधियों से गांव विकास की अपेक्षा करना बेईमानी होगी ।पंचायत चुनाव भारतीय राजनीति की प्रथम सीढी है साथ भारतीय राजनीति का आईना भी ।जिस प्रकार विधान सभा का चुनाव जीतने के उपरान्त विधायक पांच वर्ष तक जनता के पास नहीं जाता ठीक उसी प्रकार पंचायत चुनाव जीतने के उपरान्त पंचायत प्रतिनिधि पांच वर्ष तक चुनाव मे खर्च हुए पैसे की वसूली मे लगा रहता है जो गांव विकास के लिए आने वाले सरकारी धन को गांव सचिव के साथ मिलकर हजम कर जाते है और गांव विकास की बात सिर्फ़ कल्पना मात्र रह जाती है । गांव का कमजोर वर्ग ऐसे धनबली औऱ बाहुबली पंचायत प्रतिनिधियों की शिकायत भी नहीं कर पाते कुछ इस तरह पंचायती राज व्यवस्था अपने विकास की गंगा गांवों मे बहा रही है ।
सैद्धांतिक रूप मे पंचायती राज अधिनियम मे प्रावधान है कि वर्ष मे दो बार ग्राम पंचायत की खुली बैठक होगी जिसमें गांव के विकास के सभी प्रस्ताव लिखे जायेंगे लेकिन व्यवहारिक रूप मे ऐसा कुछ भी नहीं होता सब कुछ चुपचाप तरीके से पंचायत प्रतिनिधि व गांव सचिव अपने आप ही कर लेते है ,कुछ इसी तरह पंचायती राज व्यवस्था अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रही है।
-अजय पाल नागर