Wednesday, September 23, 2026

जाट समाज की लत्ता ओढाने की प्रथा,जो रुढ़िवादी समाज के मुंह पर तमाचा थी !

भारतीय समाज में अंधविश्वास की जड़े कितनी गहरी है ये इस बात से समझा जा सकता है कि आये दिन मनहूस और अशुभ मानकर कितनी ही बहू बेटियों को प्रताड़ित किया जाता है ! कितनी ही लडकियों की शादी में अंधविश्वास की वजह से अडचने आ जाती है विधवा विवाह की तो बात ही छोडिये !

लेकिन आज हम बात कर रहे है जाट समाज की जोकि पूर्व में अधिक शिक्षित न होते हुए भी कितना तर्कशील था ये कहानी पढ़कर समझ आ जाएगा ! जाट समाज विधवा पुनर्विवाह की परंपरा को बहुत पहले से समर्थन देते आ रहा है ! ऐसा ही एक किस्सा एक जाट युवक मंदीप सिंह दलाल ने अपनी फेसबुक पर शेयर किया है –

jat women
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रोहतक के पास गाँव है एक, किलोई ! हुड्डा जाटों का । मेरी दादी वंही से हैं । मेरी दादी ने किस्सा बताया था । उनके पैतृक गाँव का ही। पुरानी बात है । एक परिवार में कोई छः सगे भाई थे । बड़े की शादी हुई तो “गल्हो” गाँव में आई । जिन्हें किलोई में आगे चल “दादी गल्हो” कहने लगे थे । पहली शादी से गल्हो को एक बेटी हुई थी और पति की मौत हो गयी । गल्हो को छोटे देवर का “लत्ता ओढा” (पुनर्विवाह) दिया गया ।  एक बेटी उससे हुई और साल दो साल में दूसरे पति की भी म्रत्यु हो गयी । बताते हैं गल्हो को फिर से छोटे देवर का लत्ता ओढा दिया, उससे एक लड़की हुई और वो भी चल बसा। गल्हो पाँच बार ब्याही गयी और हर बार एक लड़की हुई । हर बार पति की म्रत्यु हुई वो भी साल दो साल भीतर । सबसे छोटा देवर “ज्ञानी” बचा था बस। आखिर में ज्ञानी को ब्याह दी गयी । ज्ञानी से गल्हो को एक बेटा हुआ । कहते हैं ज्ञानी बड़ा मसखरा था । मज़ाक़ में बोलता ~”गल्हो तन्नै पांच खाये, मैं तन्नै खाऊंगा पहलम”  ज्ञानी बूढ़ा हो मरा । गल्हो से बाद में मरा।

आज जब देखता हूँ कि अगर किसी कारणवश पति की मौत शादी के 2-3 साल भीतर हो जाये तो लड़की को मनहूस, कसाण और भी पता नहीं कितने ताने सुनने पड़ते हैं । और अगर गलती से मांगलिक निकल आये तो बेचारी का जीना और भी हराम कर देते हैं ।

पंडे पुरोहितों ने जो अंधविश्वास और पाखण्ड के दम पता नहीं कितनी लड़कियों का जीवन बर्बाद किया है । कोई हिसाब नहीं । आम जनमानस इनके जाल में उलझ जो कुकर्म ना करे वो कम है ।

jat community jaat जाट समाज
Pic source – Google

जाट एक रैशनलिस्ट कौम रही है । जब धर्म के नाम पर विधवा विवाह प्रतिबन्धित थे, मांगलिक दोष के चलते कन्या को मनहूस मानते थे, पति की म्रत्यु के बाद सफेद कपड़े पहनना और सिर मुंडाने की प्रथा थी । सती प्रथा का तो जिक्र ही क्या । वो तो हत्या थी ।

उस वक़्त यहां “ज्ञानी” जैसे अनपढ़ जाट थे जो मनहूस को छः बार ओढ़ने से भी नहीं डरते थे । किसी जाटणी का सिर नहीं मूंडा जाता था । कोई सफेद कपड़े नहीं पहनती थी । विधवा विवाह तो कभी से लागू है । यहाँ तो सारे ही “राजाराम मोहन राय” थे ।

दुनिया इन्हें धर्मभृष्ट और पागल कहती थी मगर इसे कोई फर्क ना पड़ता था । आज जब “पढ़े लिखे” गधों को मांगलिक दोष और ग्रहों की दशा सुधारने के लिए पंडित जी महाराजों के पास बैठे देखता हूँ तो बड़ी हंसी आती है ।

ये हमारी शिक्षा व्यवस्था की फेलियर है कि अनपढ़ “ज्ञानी” तर्कशील था और आज पढ़े लिखे मूर्ख पता नहीं कहाँ कहाँ माथा टेक रहे हैं !

-चौधरी मंदीप सिंह दलाल

साफ़ तौर पर ये भी कहा जा सकता है कि जाट समाज ने पूर्व में भी अपने यहाँ इस तरह की गलत परम्पराए चलने नहीं दी और तर्कशील रहकर इन कुरीतियों का विरोध किया ! एक बात और – विधवा पुनर्विवाह की यह प्रथा स्वेच्छिक थी , इसमें कोई जबरदस्ती नहीं थी ! यानि स्त्री की इच्छा का पूरा ध्यान और सम्मान रखा जाता ! हरियाणा में इस प्रथा को “लत्ता ओढ़ाना ” या करेवा भी बोलते है ! शुरू में इस प्रथा का कथित उच्च समाज ने काफी विरोध किया और जाटो को इसी वजह से नीची जाति का मानना शुरू कर दिया ! लेकिन सोचिये जो समाज बहू बेटियों के जीवन के लिए इतना प्रगतिवादी सोच रखता  हो उससे क्यों न शिक्षा ली जाए ?  धीरे धीरे इस प्रथा को दिल्ली एनसीआर के अन्य पिछड़ी जातियों ने भी समर्थन दिया और अपनाया ! जबकि स्वघोषित उच्च समाज इसके खिलाफ था ! जाट समाज ने सती  प्रथा और जोहर प्रथा को भी अपने यहाँ पनपने नहीं दिया !

जाट महिलाएं jat women

1850 के दशक में चले विभिन्न समाज सुधार आंदोलनों के विरोध में तब के रुढ़िवादी समाज ने बहुत प्रतिक्रिया दिखाई और इन सुधारों का विरोध भी किया ! उसी दौरान ईश्वरचन्द्र विधासागर ने विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबन्ध को ख़त्म करने के लिए अभियान चलाया और पुस्तक भी प्रकाशित की जोकि बताती थी कि हिन्दू धर्म में विधवा पुनर्विवाह शास्त्र सम्मत है !  स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी समाज सुधार आन्दोलन चलाये जिसमे उन्होंने भी विधवा पुनर्विवाह पर जोर दिया ! आर्य समाज के समाज सुधार आंदोलनों का जाट समाज पर गहरा असर रहा और काफी क्षेत्रो में जाट आर्य समाज से जुड़े रहे ! आज भी जाट समाज विधवा पुनर्विवाह या “लत्ता ओढ़ाना”  की परंपरा पर कायम है ! वाकई तर्कशील माने जाने वाले जाट इस मामले में बहुत आगे है !

Sunil Nagar

Sunil Nagar
Sunil Nagar
ब्लॉगर एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ।
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