Sunday, April 19, 2026

लगान के कैप्टन रसेल ने इस तरीके से आपको बनाया बेवकूफ

आमिर खान के करियर की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म लगान 15 जून 2001 को रिलीज हुई थी। इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक थे आशुतोष गोवारिकर। इस म्यूजिकल स्पोर्ट-ड्रामा फ़िल्म को जब निर्माता नही मिले तो आमिर खान ने इसे स्वयं प्रोड्यूस करने का निर्णय लिया। कारण था कहानी और निर्देशक पर भरपूर विश्वास!

लगान की शुरुआत

आशुतोष की पहली फ़िल्म ‘पहला नशा’ डिज़ास्टर साबित रही थी और दूसरी फ़िल्म ‘बाज़ी’ सिर्फ कहने के लिए हिट थी। आशुतोष ने दिलीप कुमार की नया दौर से प्रेरणा लेकर इस फ़िल्म की कहानी लिखी। पहली बार जब आमिर ने फ़िल्म की कहानी सुनी तो उन्होंने आशुतोष को तुरंत ही मना कर दिया और सलाह दिया कि कुछ अच्छा लिखकर लाओ। लेकिन जब आमिर ने पूरी स्क्रिप्ट सुनी तो उनकी आंखें मन हो आईं। उन्हें मालूम हो चुका था कि फ़िल्म में कुछ तो बात है।

लगान मूवी फ़िल्म lagaan

शूट में आईं बहुत सी तकलीफें

लगान के निर्माण में टीम को बहुत तकलीफों और अड़चनों का सामना करना पड़ा। फ़िल्म की कहानी के लिए ब्रिटिश काल वाला गाँव खोजना बेहद संघर्षपूर्ण रहा। कई गांवों में भटकने के बाद आशुतोष ने गुजरात के भुज से कुछ दूरी पर बसे कुनरिया को अपनी कहानी का चंपानेर बनाया। शूटिंग से चार महीने पहले ही गाँव वालों से मिट्टी के घर और मंदिर का निर्माण करवाया गया। घरों के अंदर ही कलाकारों के लिए छुपे हुए टॉयलेट भी बनवाये गए थे।

स्ट्रिक्ट शेड्यूल के साथ फ़िल्म की शूटिंग जनवरी में शुरू हुई थी और जून तक चली। गर्मी में कच्छ का पारा 50 डिग्री तक पहुंच जाता है, ऐसे में कलाकारों के साथ फ़िल्म के क्रू को भी स्वास्थ्य संबंधी समस्यायों से जूझना पड़ रहा था। शूटिंग के दौरान ही निर्देशक को स्लिप डिस्क की समस्या आई। उन्हें आधी फ़िल्म बिस्तर पर लेटकर डायरेक्ट करनी पड़ी। फ़िल्म में अहम किरदार निभा रहे ए. के. हंगल जी को हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा और शूटिंग के लिए हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठा करने में पसीने छूट गए।

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लगान की सबसे बड़ी मिस्टेक

बात करते हैं फ़िल्म के उस दृश्य की जिसमें बहुत बड़ी मिस्टेक थी। फ़िल्म का वह सीन तो हर किसी को याद होगा जिसमें भुवन को जीत के लिए एक गेंद में एक बाउंडरी की दरकार होती है। भुवन के दिमाग में तीन गुना लगान की बात चल रही होती है। उसे उस आशा को सच में करके दिखाना था जो उसने गाँव वालों को दिखाया था।

बॉलर गेंद फेंकता है और भुवन उसे बल्ले से बाउंडरी की दिशा में मारता है। गाँव वालों को चैलेंज देने वाला कैप्टन रसेल उस गेंद को पकड़ने के लिए भागता है और पकड़ लेता है। वह खुशी से चिल्लाता है लेकिन उसके चेहरे पर निराशा छा जाती है जब उसे मालूम होता है कि वह बाउंडरी के बाहर जा चुका है और भुवन की टीम जीत चुकी है।

इस सीन के क्लोजप में जब कैप्टन रसेल गेंद कैच करता है तव वह सिर्फ कैच करने का अभिनय करता है और आप गौर से देखने पर पाएँगे कि उसके हाथ में कोई गेंद नही है। बल्कि इसी सीन के दूसरे शॉट में कैप्टन रसेल के हाथ में गेंद है।

दूसरे दृश्य में गेंद दिखा दी जाती है

ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई यह मदर इंडिया और सलाम बॉम्बे के बाद तीसरी भारतीय फिल्म थी। इतनी बड़ी फिल्म के क्लाइमेक्स में निर्देशक ने ऐसी गलती कैसे कर दी? क्या क्रिकेट पर बन रही फ़िल्म के सेट पर बॉल की कमी हो गई थी या मेकर्स ने सोचा होगा कि बिना गेंद के ही शॉट लेलो क्लोजप में, दर्शकों को क्या ही पता चलेगा।

फ़िल्म में क्राउड सीन शूट करते समय सभी क्रू मेंबर गाँव वालों के भेष में रहते थे ताकि अगर कोई गलती से कैमरे में कैद हो जाए तो शॉट पर असर न पड़े। क्या आपने तस्वीर में कैप्टेन रसेल के पीछे खड़े उस व्यक्ति को देखा? जिसके लाल रंग की चादर के नीचे कैमरा छिपा है ।

ऐसे ही एक अन्य दृश्य में कचरा जब बेटिंग कर रहा होता है तो स्कोर बोर्ड पर 314 रन दिखाए जाते है। कचरा जब 2 रन लेता है तो फिर बोर्ड और 313 रन दिखते है ।

इस फ़िल्म के साथ सनी देओल की ग़दर भी रिलीज हुई थी। ये दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस में सुपरहिट रही और कंटेंट के मामले में बहुत आगे थी।

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