गांधी जी चंपारण नहीं पहुँचते तो शायद अपना पहला सत्याग्रह नहीं शुरू कर पाते. ग्राउंड जीरो पर किसानों की समस्या का स्वयं अनुभव करने के बाद ही वह अपनी बातों को पुख्ता तरीके से रख पाने में कामयाब हो पाए.
नेल्सन मंडेला अगर खुद ऑपरेस्ड सोसाइटी से नहीं आते तो दक्षिण अफ्रीका की व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन लाना उनके लिए भी मुश्किल था. अपने बाबा-साहब ने जाति व्यवस्था का ताप झेला था, फिर वह इसके खिलाफ खड़े हो पाए.
मर्क्सिस्म और लेनिनिज्म की थ्योरी भी दोनों नेताओं द्वारा व्यक्तिगत तौर पर चीज़ों को देखने-परखने के बाद उत्पन्न हुईं. हिटलर की तरह नहीं कि मन में बिठा लिया कि हम आर्य हैं. हम श्रेष्ठ हैं. यहूदी क्यों बस रहे हैं हमारे यहाँ. निकाल फेंको कमबख्तों को. मार दो. जला डालो.
वैसे ही अपने यहाँ के कई नेता हैं. जनता की समस्या को कभी ज़मीन पर उतर कर देखा नहीं पर लफ्फाज़ी दुनिया भर की कर लेते हैं. कभी अटपटा भाषण दे देते हैं. कभी किसी गरीब के यहाँ खाना खा लेते हैं, हो गयी उनके कर्तव्यों की इतिश्री.

मुझे लगता है हमारे यहाँ नारीवाद या नारी-विमर्श का मुद्दा भी ठीक इसी दिशा में चलता है. चूंकि भारत स्वाभाविक रूप से पितृसत्तात्मक देश है, यहाँ उन लड़कियों या महिलाओं को ढूंढ पाना थोडा मुश्किल है जिन्होंने कभी जेंडर जनित भेद-भाव न झेला हो. उच्च वर्ग से हैं तो कभी ऑफिस में कम सैलरी, तो कभी बिज़नेस में भाई को प्रिविलेज. अक्सर ही परिवार के दम्भी पुरुषों द्वारा यह कह कर घर बिठा दिया जाना कि काम करके क्या करोगी. हम हैं न तुम्हारे लिए.
अगर मध्यम वर्ग का हिसाब किताब है तो मैक्सिमम घर में औरतें सेकंड ग्रेड सिटिजन हैं. भरोसा नहीं हो रहा तो एक बार अपने घर की औरतों की स्थिति पर इमानदारी से गौर कीजियेगा. इन दोनों ही सोसाइटीज़ के लिए औरत और उसकी देह इज्ज़त का मामला है.

बात अगर निम्न मध्यम वर्ग और उससे भी दबे हुए तबके की हो रही है तो यहाँ तो क्या लड़का और क्या लड़की दोनों ही वंचित श्रेणी में हैं. दोनों ही पढ़ाई जैसी बेसिक सुविधाओं से दूर. यहाँ असल समस्या बाल विवाह, लड़कियों में इससे पैदा हुई हेल्थ प्रोब्लेम्स और घरेलु हिंसा है.
देह मुक्ति समाज के इस तबके के लिए ख़ास मैटर नहीं करती. रिश्ते बनाना और रिश्ता तोडना इतना मुश्किल नहीं है इनके लिए. इन्हें न तो ‘महीने’ का ज़िक्र करने में बुरा लगता है न ही ‘ब्रा’ इनके लिए बड़ा मसला है. वे सिर्फ साड़ी लपेटे हुए, बिना ब्लाउज के भी मध्यम वर्गीय और उच्च वर्गीय औरतों से ज्यादा कॉंफिडेंट नज़र आती हैं.
उन्हें घुट्टी में चुप रहना नहीं सिखाया जाता. मुझे हमेशा महसूस होता है कि अपने अधिकारों को लेकर वो हम जैसी फेसबुक क्रांतिकारियों से ज्यादा सजग हैं. वो चाहें जो करें, कभी अपने आप को कमज़ोर नहीं आंकती. मजदूरी हो या खेती, वेतन बराबर लेती हैं.

पर हम क्यों पीरियड और देह का मुद्दा उठा रही हैं?
इसका एक ही जवाब है. हमारी देह को देवी का दर्जा देकर हमें बाँध दिया गया है. इस गुलामिकरण की प्रक्रिया में इज्ज़त के तार इतनी बारीकी से हमारी देह से लपेटे गए कि पहले हमारा बाहर जाना बंद हुआ फिर अधिकार ख़त्म होते चले गए. पीरियड जैसे टैबू भी इसी मानसिकता के सबसेट हैं जिसने औरतों के सबसे अच्छे पहलु को शर्म से जोड़ दिया. लड़की पढने के लिए बाहर नहीं जा सकती, इज्ज़त पर आंच आ जाएगी. जो पढेगी नहीं तो व्यापार और दुनिया की समझ कहाँ से आएगी ? काम करना कैसे शुरू करेगी ? जब तक काम नहीं शुरू होगा, सामान वेतन की मांग कहाँ से आएगी ?

तो साहब करने दीजिये न हमारी देह पर हमें खुद कब्ज़ा. बातें करने दीजिये इस पर खुल कर. हो सकता है ये हमारी मानसिक ग्रंथियों को भी खोल दे. एक बार ग्रंथियां खुलेंगी तो हम बेलौस दौड़ने लग जायेंगी. वादा रहा, रफ़्तार इतनी तेज़ होगी कि आप भी ‘वाह-वाह’ कर उठेंगे.
एक बात और, एक बार हमारे जूते में पैर रखिये, पहन कर चलिए, फिर घावों का इलाज़ बताइयेगा. #Feminism
-अणु शक्ति सिंह
(लेखिका दिल्ली से है और सोशल मीडिया पर विभिन्न विषयों पर अपनी राय बेबाक तरीके से रखती है )