“प्रेम”
गुवाहाटी शहर के बीचोबीच एक पार्क..उसमे एक झील ..उसके किनारे लगी नीले रंग की वो बिना हत्थेदार बेंच..थोड़ी थोड़ी जंग लगी हुई…कही कहीं से रंग उखड़ा हुआ .और उस पर एक सुन्दर सा मानव-पंछी जोड़ा….स्कूल ड्रेस में पार्क की नीरवता को अपने मधुर कलरव से रंगता हुआ..बेंच पर पैर लटकाए हुए ..

“आज फोन भी नहीं किया था ना तुमने”
“नाईट पैक ख़तम हो गया ..पता ही न चला”
“अरे मैसेज तो आता हैं न ..डाल देते”
“हा ! वो कई दिन पहले से आने लगता है ..मुझे लगा एक दो दिन और चल जायेगा
“एक कॉल तो कर लेते ”
बैलेंस भी नहीं था न..खाली एक रूपये बचे है इमरजेंसी के लिए”
“तो फिर ?”
“अरे आज ही कर लूँगा बाबू ..पंहुचते ही तुरंत..तुम टेंशन मत लो”
“मणिपुरी बस्ती चले ? या फिर क्रिस्चियन बस्ती ?…पता है..वहां KFC नाम का कोई रेस्टोरेंट खुला है अभी हाल ही में ..60 रूपये की तो सिर्फ कॉफी मिलती है वो भी एक कप ”
“तुम्हारा कुछ खाने का मन हो तभी चले…वैसे मेरा तो आज कोई इरादा नहीं है.”
“मुझे एक डिसेक्शन बॉक्स भी खरीदना है .क्लास शुरू हुए बीस दिन से ज्यादा हो गये..बायो की प्रक्टिकल क्लास में बिना इसके घुसने नही देते सर ”
“अब तक कैसे जाती थी”
बस कुछ इंतजाम कर लेती थी..यू ही और क्या”
“आज मन नहीं है.. कहीं जाने का ”
“तुम्हारा क्या इरादा है आखिर ”
“बस यही बैठे रहना है ..बात करनी है तुमसे…देखना है तुम्हे रोज की तरह ”
“ठीक है फिर..नहीं जाते..मेरा भी कुछ खास मन नहीं”
“नहीं अगर तुम्हे कुछ खाना है तो बोलो..यही बगल से ही ले लूँगा न ”
“नही .मेरा भी मन नहीं है .मैं बस यू ही कह रही थी ”
“तो फिर ?”
” तो कुछ नहीं ! यही बैठेंगे हम .शाम को वापस जाते समय मन किया तभी खायेंगे साथ में ”
उसके द्वारा बेहद मासूमियत से किये जा रहे बहानों को वो गौर से सुने जा रही थी…उसके पास शायद पैसे नहीं थे भांप गयी थी वो .पुरुष अगर प्रेम में हो तो फरेब नहीं करता और नारी प्रेम में हो तो बिना कहे ही सब कुछ समझ जाती है. उसका मासूम बहाने बनाना और टालने का कारण उसकी समझ में आ गया था.
दोनों बैठे रहे ! तब तक चहकते रहे ..जब तक शाम कि नहीं हो गयी थी.अब सिटी बस पकड़कर अपने-अपने घोंसलों की तरफ जाना था.
मुस्कुराते हुए विदा ली अगली मुलाकात तक .
लेकिन बेंच से उठने के पहले ही इस बीच उसके स्कूल बैग में धीरे से पांच सौ का वो नोट डाल दिया था जिसे वो घर से डिसेक्शन बॉक्स खरीदने के लिए लायी थी.
प्रेम सिर्फ प्रदान करना सिखाता है ..प्रेम में ग्राही नहीं बल्कि प्रदाता होने की ललक होनी चाहिए.
यही तो जिंदगी है
– गीताली सैकिया