यूं तो नार्थईस्ट के प्रत्येक ट्राइब्स का भारतीय प्राचीन इतिहास के साथ सीधा सम्बन्ध है .नार्थईस्ट की विभिन्न ट्राइबल ग्रुप्स स्वयं को भारतीय प्राचीन पौराणिक इतिहास के वंशजों से खुद का सम्बन्ध बताते और उनका प्रमाण दर्शाते हैं. उनकी पूजा पध्ह्द्तियाँ , संस्कार और रीतियों में पौराणिक पात्रों और घटनाओं से उनके सम्बन्ध साफ़ बयाँ होते हैं.
नार्थईस्ट के लोंगो को चायनीज कहकर तिरस्कृत करने वालों को नार्थईस्ट ट्राइब्स का भारतीय इतिहास के साथ सम्बन्ध जरूर पढना चाहिए.

अरुणाचल प्रदेश की ट्राइब्स में से एक है – इदु मिश्मी. ये लोग खुद को भगवान श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी रुक्मिणी के वंशज बताते हैं.कथा के अनुसार रुक्मणी यहाँ के भीश्मनगर की राजकुमारी थीं .उनके पिता राजा भीष्मक और उनका एक भाई था जिसका नाम रुक्मी था.
जब रुक्मिणी को श्रीकृष्ण से प्रेम और विवाह तय होने की बात हुई तो ये बात राजकुमारी के भाई रुक्मी को पसंद नहीं आई .उसने शिशुपाल के साथ रुकमिणी का विवाह तय कर दिया. रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण तक गुप्त रूप से ये सूचना पहुचाई ताकि श्रीकृष्ण रुक्मिणी को सुरक्षित अपने पास ले जा सके.श्रीकृष्ण और रुक्मिणी को रुक्मी ने पहचान लिया और श्रीकृष्ण के साथ हुये यूद्ध में रुक्मी की हार हुई.जैसे ही श्रीकृष्ण ने रुक्मी का वध करना चाहा रुक्मिणी ने अपने भाई की प्राण की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण से प्रार्थना की. श्रीकृष्ण मान तो गए लेकिन उन्होंने हार के निशान के रूप में रुक्मी के सर को सुदर्शन चक्र से गंजा कर दिया .

आज भी मिश्मी ट्राइब के लोग सर को गंजा रखते हैं .इसलिए उन्हें असमिया में “चुलीकटा” कहा जाता है. .ये मिश्मी हिल्स के आस पास लोहित नदी के दोनों किनारों पर ज्यादातर दिबांग घाटी में निवास करते हैं.इदु मिश्मी के अलावा पूर्वोत्तर भारत के अन्य ट्राइबल समूह भी हैं जिनका सम्बन्ध प्राचीन भारतीय पौराणिक इतिहास से है. इनमे बोडो , खासी, कार्बी , जयंतिया , दिमसा , नागा आदि प्रमुख हैं.
विश्वास रखिये ! नार्थईस्ट के लोग भी उतने ही भारतीय हैं जितने बाकी लोग…चायनीज नही है हम.
यही नहीं …. नार्थईस्ट में वैदिक और पौराणिक कथाओं से सम्बद्ध कई स्थान हैं.
वर्तमान हालातों में बेशक कुछ अंतर नजर आता हो लेकिन अगर आप यहां के धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक साक्ष्यों का विस्तार से अध्ययन करें तो पता चलता है कि प्राचीन भारत का विस्तार न सिर्फ पूर्वोत्तर से आगे तक था बल्कि पूर्वोत्तर के ये राज्य प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण भाग थे.

कहते हैं कि परशुराम ने जब पिता मुनि जमदग्नि के आदेश पर अपनी माँ रेणुका का सिर धड़ से अलग किया तो उनका फरसा उनके हाथ से अलग ही नही हो रहा था..ये देखकर परशुराम घबरा गए.पिता से इसके समाधान की जिज्ञासा की तो उन्होंने बताया कि “तुम पर मातृहत्या का पाप लगा है .तुम इसी अवस्था मे देश की अलग अलग नदियों में स्नान करो .जिस नदी के जल से तुम्हे मुक्ति मिलेगी वही ये फरसा तुम्हारे हाथ से अलग हो पायेगा.”
परशुराम देश की अनेक नदियों में भ्रमण करते रहे.परन्तु उन्हे मातृहत्या के पाप से मुक्ति न मिली.इसी क्रम में वे लोहित नदी के किनारे पहुंचे और यहां स्नान किया.संयोग से उन्हें मुक्ति मिली और फरसा उनसे अलग होकर कुंड में गिर गया.तब से इस स्थान को परशुराम कुंड कहा जाने लगा. कालिका पुराण में इसका वर्णन है.
ये एक धार्मिक स्थान है और प्रत्येक मकर संक्रांति को यहां लोग जुटते है .लेकिन स्नान सिर्फ वही करते हैं जिनके माता पिता इस संसार मे नही हैं.स्थानीय लोग इसे प्रभु कुठार कुंड कहते हैं .ऐसा माना जाता है कि यहां स्नान करने से सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है.
तिनसुकिया सबसे करीबी रेलवे स्टेशन है.उसके बाद नामसाई के लिए बस लेना पड़ता है..हालांकि ढोला-सादिया पुल शुरू होने के बाद यहां तक पहुंचना काफी आसान हो जाएगा.प्राकृतिक रूप से ये जगह काफी समृद्ध और दर्शनीय है और अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित है. नार्थईस्ट के लोंगो को चायनीज कहकर तिरस्कृत करने वालों को नार्थईस्ट ट्राइब्स का भारतीय इतिहास के साथ सम्बन्ध जरूर पढना चाहिए.

मैं कोई सेलिब्रिटी नही हूँ.एक बेहद साधारण परिवार से मेरा वास्ता है .घर का हर सदस्य के दिन में दस से बारह घण्टे काम करने के बाद हमारी दाल रोटी चलती है.लिखना मेरा शौक नही है, मेरा पैशन नही है,,,लिखना मेरी मजबूरी है ताकि आप के कानों में नार्थईस्ट की आवाज किसी न किसी बहाने से गूँजती रहे.
-गीताली सैकिया
north east ke log hamare bhai hai jo esa nahi manta wo gaddar hai
North East ke log sundar hai, priy hai , apane hai . gair kahana murkhata hai.