जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस्लामिक देशों में महिलाओं को अन्य देशों के मुकाबले उतनी छूट नहीं होती है। इन देशों में महिलाओं के पहनावे से लेकर उनके रहन-सहन, यहां तक की उनकी शिक्षा पर भी विशेष प्रतिबंध होते हैं। ऐसे में इन महिलाओं का जीवन नर्क से भी बद्तर हो जाता है। हालांकि, अब कुछ देशों में कट्टरपंथी रवैये में थोड़ी ढील बरती जाने लगी है जिसके बाद कई जगहों पर अब देखा जाता है कि महिलाएं पुरुषों के साथ बैठकर काम करती हैं और अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करती हैं।
कई बार देखा गया है कि पाकिस्तान जैसे तमाम देशों में महिलाओं की इच्छाओं का गला घोंट दिया जाता है। धार्मिक कट्टरता के नाम पर हो रहा यह ढोंग महिलाओं की निजी जिंदगी को पूरी तरह से तहस-नहस कर देता है।

हालांकि आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जहां के लोग रहते तो पाकिस्तान में हैं लेकिन इस्लामिक कट्टरता से पूरी तरह से परे हैं।
कलाशा जनजाति की सोंच आम पाकिस्तानियों से है अलग
हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित चित्राल घाटी की। इस घाटी में कलाशा नामक एक जनजाति निवास करती है। इस समुदाय के लोग अफगानिस्तान बॉर्डर से लगे बिरीर, बाम्बुराते और रामबुर इलाके में रहते हैं। 4 हजार के आस-पास की आबादी वाला यह समुदाय पाकिस्तान के बहुसंख्यक मुस्लिमों से सोंच और समझ दोनों में बिल्कुल अलग है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस इलाके की महिलाएं बड़ी ही दिलफेंक किस्म की होती हैं। अगर इन महिलाओं का दिल किसी गैर मर्द पर आ जाता है तो ये अपनी पुरानी शादी तोड़कर उस मर्द के साथ रहने लगती हैं और संबंध बनाती हैं।
कामोस पर महिलाएं तलाशती हैं मर्द
कलाशा जनजाति के लोगों को लेकर कहा जाता है कि इस समुदाय के लोग तीन मुख्य त्यौहार मनाते हैं जिनमें कामोस, जोशी और उचॉ शामिल हैं। इन सभी त्योहारों में महिलाओं के लिए सबसे मुख्य त्योहार होता है कामोस। दिसंबर के माह में मनाए जाने वाले इस पर्व पर महिलाएं सज-धज कर तैयार होती हैं। इस दिन महिलाएं और लड़कियां अपने लिए मर्द तलाश करती हैं। यह त्यौहार अविवाहित लड़कियों के लिए तो खास होता ही है जबकि विवाहित महिलाओं के लिए तो ये और भी खास होता है। दरअसल, इस दिन विवाहित महिलाओं को छूट होती है कि यदि उन्हें कोई शख्स पसंद आ जाता है तो वे उससे शादी कर लेती हैं। उनकी पहली शादी का उनपर कोई बंधन नहीं होता है।
मौत पर मनाते हैं जश्न
किसी व्यक्ति की मौत पर इस समुदाय के लोग ढोल-नंगाड़े बजाकर जश्न मनाते हैं। इन लोगों का मानना है कि इंसान धरती पर ईश्वर की मर्जी से जन्म लेता है और उसी की इच्छा से उसकी मौत होती है। ऐसे में वह इंसान अपने मालिक के पास वापिस लौट जाता है। इस समुदाय के लोग इस दिन शराब पीकर झूमते-गाते हैं।